सत्संग परिचय
दिव्य चेतना सत्संग के संस्थापक एवं संचालक परमहंस स्वामीनन्द जी महाराज हैं। दिव्य चेतना एक ईश्वरीय प्रेरणा है। इसका चयन एक ईश्वरीय आदेश के तहत हुआ है । हमारे अन्दर एक दिव्य चेतन सत्ता कार्य कर रही है । इसकी दिव्यता से हर वस्तु दिव्य हो जाती है। दुःख भी दिव्य होकर सुख और आनन्द में बदलने लगता है। इसकी जागृति हर मानव के लिए आवश्यक है। यही हमारा लक्ष्य है।
आगामी सत्संग कार्यक्रम
हमारे पूज्य गुरुदेव
दिव्य चेतना सत्संग के संस्थापक ब्रह्मलीन परमहंस स्वामीननन्द जी महाराज हैं। आपका अवतरण तिथि 29 अक्टूबर 1943 ई. एवं निर्वाण तिथि 4 जनवरी 2020 ई. है। आपके पिता का नाम स्व. जटाधारी सिंह एवं दादाजी का नाम स्व. रामसुभग सिंह तथा आपके एकल भ्राता का नाम स्व. राजमंगल सिंह है। आपका जन्म ग्राम- सुजानपुर, पोस्ट-भानपुर, थाना-दिनारा, जिला-रोहतास के एक सम्पन्न उज्जैन राजपूत वंश में हुआ। आप शुरु से ही न्यायी व्यक्तित्व के धनी रहे। आप सुंदर वस्त्र पहनने, घुड़सवारी करने, वेटलिफ्टिंग, डिस्कसथ्रो एवं तैराकी के शौकीन रहे। आप सी.सी.एल. (सेंट्रल कोलफील्ड लिमिटेड) में माइनिंग इंजीनियर के रुप में कार्यरत रहे।
सत्संग का लक्ष्य
1.अपने कर्तव्य को जानो। तुम्हारे कर्तव्य में दूसरों का अधिकार छुपा हुआ है और उसके कर्तव्य में तुम्हारा अधिकार छुपा हुआ है।
2.अपने चरित्र का निर्माण करो। एक चरित्रवान ही ईश्वर को प्राप्त कर सकता है।
3.ईश्वर प्राप्ति के लिए काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद को छोड़ना नहीं सत्य की तरफ मोड़ना है।
4.आंतरिक ध्यान ही मुख्य है जिसके लिए पाँच यमों में से एक यम को लक्ष्य बनाओ।
5.ईश्वर एक शक्ति है जो सभी प्राणी में सिंगल फेज में रहती है जिसे आत्मा कहते हैं। यह ध्यान साधना द्वारा अपने फुल फेज में आकर परमात्मा तथा परमेश्वर बनती है जो साधक के इच्छा अनुसार विभिन्न रूप धारण कर कार्य करती है।
6.जीवन में एक सद्गुरु धारण करो जो माया (पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण) के बंधनों को काटकर विश्व शक्ति से संबंध जोड़ सके जिसे तुम फौरन महसूस कर सको।
7.आत्मसाक्षात्कार ही जीवन का लक्ष्य है। इससे प्राप्त होती है निर्भीकता, क्षमा, दया, दृढ़ता तथा सहनशीलता जैसे गुण।
8.जितने भी भगवान के साकार स्वरूप हैं उसे गुरु कहते हैं। ईश्वर तो एक निराकार शक्ति है। जब मानव को उसे अपना संदेश देना होता है तो वह गुरु रूप में आता है। वह उसका प्रज्वलित रूप होता है।
9.सेवा ही जीवन का धर्म है पर उसे समझने के लिए सत्संग करना होगा।
10.गृहस्थी एक प्रयोगशाला है जिसमें रहकर अपने हर कमियों की जाँच पड़ताल की जा सकती है।
11.अन्यायी कभी ईश्वर को प्राप्त नहीं कर सकते। अतः उसे प्राप्त करने के लिए न्यायी बना होगा।
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